अमेरिका ढाई सौ वर्ष का हुआ। इस शुक्रवार-शनिवार उसके जश्न की कुछ झलकियां टीवी पर देखी। एक परिचित धुन कानों में पड़ी—“डोंट स्टॉप बिलीविन” (Don't Stop Believin')। बरसों पुराना यह गीत मेरी पचास वर्षों की स्मृतियों को खोल गया। गीत सुन मुझे ब्रूस स्प्रिंगस्टीन की आवाज़ भी याद हो आई।

संयोग है मैं पचास साल से गवाह हूं। मैं जब छोटे से कस्बे भीलवाड़ा से निकलकर दिल्ली के जेएनयू में पहुँचा था, तब मेरे भीतर भी एक दौड़ शुरू हुई थी। दुनिया को जानने की, समझने की, पढ़ने की और अपनी टूटी-फूटी हिंदी में उसे लिखने की।

उन दिनों चालीस, साठ और पचहत्तर रुपए प्रति लेख मिलते थे। नतीजतन कनॉट प्लेस की सेंट्रल न्यूज़ एजेंसी से टाइम, द इकोनॉमिस्ट, हिम्मत, ओपिनियन, क्वेस्ट जैसी पत्रिकाएं खरीदता। दुनिया को पढ़ने के साथ-साथ देखने की आदत भी बनी।

अमेरिका की वास्तविक शक्ति व्हाइट हाउस नहीं है। वह उन करोड़ों लोगों के दिल और दिमाग में बसने वाली उस धुन और विश्वास में है, जो लोगों को सुबह यह मानकर उठाती हैं कि आज का दिन कल से बेहतर हो सकता है।